भ्रष्टाचारी का, भ्रष्टाचार के लिए, भ्रष्ट शासन

इतिहास गवाह है जब-जब अति हुई है उसका अंत भी हुआ है। भारत को आजादी के बाद एक सम्पूर्ण लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने का सपना जो देश के महापूरूषों ने देखा था वो पूरा तो हुआ पर एक सपने की तरह। जब आंख खुली तो लोकतान्त्रिक गणराज्य विखरा हुआ पाया जिसका नतीजा आज हम सभी के सामने है। नेताओं के प्रति उमड़ता जनाक्रोश, आये दिन हो रहे धरने, अनशन और विरोध प्रदर्शन ये सभी बिखरे हुए लोकतान्त्रिक देश की तस्वीर है।

गणराज्य तो जनता का राज्य होता है, एक ऐसा देश होता है जहां के शासनतन्त्र में सैद्धान्तिक रूप से देश का सर्वोच्च पद पर आम जनता में से कोई भी व्यक्ति पदासीन हो सकता है। इस तरह के शासनतन्त्र को गणतन्त्र कहा जाता है। इसी प्रकार लोकतंत्र या प्रजातंत्र इससे अलग होता है। लोकतन्त्र वो शासनतन्त्र होता है जहाँ वास्तव में सामान्य जनता या उसके बहुमत की इच्छा से शासन चलता है।

आज विश्व के अधिकांश देश गणराज्य हैं और इसके साथ-साथ लोकतान्त्रिक भी। लेकिन भारत स्वयः एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है। भारत में न केवल लोकतंत्र बल्कि गणतंत्र का भी समावेश है। यही कारण है कि इसे विश्व का सबसे बड़ा और अच्छा लोकतान्त्रित गणराज्य का दर्जा प्राप्त हुआ है।

लोकतंत्र की परिभाषा अगर आसान तरीके में समझे तो कुछ इस प्रकार है- ‘‘लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन है।’’ लेकिन आज इन सब बातों के मायने बदलते नजर आ रहे हैं। लोकतंत्र को भ्रष्टतंत्र बना दिया गया है। जिसमें ‘‘भ्रष्टाचारी का, भ्रष्टाचार के लिए भ्रष्ट शासन।’’ शामिल हो गया है।

जनता के वोट से चुने गये प्रतिनिधि चंद समय के लिए जनता के सेवक होते हैं। फिर पूरी सेवा जनता से कराते हैं। वोट को उनका अधिकार बताते है और कुर्सी पर बैठने के बाद भ्रष्टाचार को अपना अधिकार समझते हैं। देश की सेवा करने के लिए जनता को उनके कर्तव्य समझाते हैं और खुद जनता के हक की रोटी दवाकर खाते हैं।

नेताओं के भाषण अब खोखली बयान-बाजी नजर आती है। लोकतंत्र ने नाम पर नेता कुर्सी पाकर भोगतंत्र में शामिल होते जा रहे हैं। सभी प्रकार की सुख सुविधाओं का अम्बार लगाकर जनता की सेवा करते-करते नेताजी खूब मेवा खाते हैं। एक बार कोई नेता किसी मंत्री पद पर आसीन हो भर जाए, तो बस उसे तो सिर्फ अपने कुटुम्ब की सूझती है। वो हर वक्त धन को बटौरने में लगा रहता है। जिससे कि उसी आने वाली सात पीढ़ियों को कुछ करने की जरूरत ही न पड़े। इन नेताओं को जनता की नहीं कुर्सी की राजनीति करनी ज्यादा भाती है। वो जनता के अधिकारों की नहीं बल्कि कुर्सी को पाने के लिए राजनीति करते हैं।

जब देश में बड़े पदों पर आसीन मंत्री करोड़ों रूपये के घोटाले करें। जनता बेरोजगारी, तृष्दि, जिल्लत की जिंदगी जीए। भीड़तंत्र का हिस्सा बने और जिन्हें बसों, ट्रेन, सड़क पर चलने के लायक भी जगह न मिले, सुकून की रोटी न मिले, बच्चों को अच्छी शिक्षा न मिले तो बेवस जनता का आक्रोश उमड़ना लाजमी है।

लोकतंत्र हमारे देश के लिए कोई नई व्यवस्था नहीं है। देश के कुशल शासक व कुटनीतिज्ञ चाणक्य ने अपनी ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में भी व्याख्या की थी कि राजा को कैसा होना चाहिए और शासन कैसे चलाना चाहिए। चाणक्य के बारे में चीनी यात्री फाह्यान के शब्द चाणक्य के व्यक्तित्व की पूरी छलक हमारे समाने प्रस्तुत करते है- ‘‘जहां का प्रधानमंत्री साधारण कुटिया में रहता है, वहां के निवासी भव्य भवनों में निवास करते हैं, और जिस देश का प्रधानमंत्री राज प्रसादों में रहता है वहां की सामान्य जनता झोंपड़ियों में रहती है।’’

इन शब्दों से साफ झलकता है कि देश की तरक्की किस पर निर्भर करती है। चाणक्य एक महान शासक थे। आचार्य चाणक्य, विशाल राज्य के प्रधामंत्री बनने के बाद भी वन में कुटिया बनाकर रहते थे और जनता का हालचाल जानने के लिए भेष बदलकर जाया करते थे। उनके द्वारा लिखे गये चंद श्लोक एक कुशल राजा की नीति को दर्शाते हैं-

भ्रमन् सम्पूज्यते राजा भ्रमन् सम्पूज्यते द्विजः।
भ्रमन् सम्पूज्यते योगी भ्रयन्ती स्त्री तु नश्यति।।
राजा, योगी और ब्राह्मण घूमते हुए ही अच्छे लगते हैं। राजा यदि अपने राज्य के दूसरे नगरों में जाकर प्रजा से सम्पर्क बनाये नहीं रखता तो उसका विनाश निश्चित ही है। प्रमादी राजा को सेवक कभी सही जानकारी नहीं देते। वे तो सदैव चापलूसी करते हैं। अर्थात् राजा को शत्रु व मित्र की जानकारी के लिए घूमना जरूरी है।

वरं न राज्यं न कुराज्यराज्यं, वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो, वरं न दारा न कुदारदाराः।।
मनुष्य के लिए राज्य से बाहर रहना अच्छा है, किन्तु दुष्ट राजा के राज्य में रहना अनुचित है। श्रेष्ठ राजा के राज्य में रहने से राज्य का विस्तार होता है।

चाणक्य के कहे अनुसार देश का विनाश तो निश्चित है। क्योंकि इस देश में राजा, मंत्री, संत्री और नेता महलों में रहते हैं जहां कि गरीब, लाचार, बेसहरा जनता झुग्गी झोपड़ियों में, तो ऐसे देश का कहां तक विकास समझा जाएगा? वहीं जब देश के ऊंचे पदों पर आसीन मंत्रियों को भोग विलास्ता से फुरसत नहीं तो वो जनता का हालचाल क्या जानेंगे? तब तो जनता के दिमाग में एक ही बात आती है- वरं न राज्यं न कुराज्यराज्यं, भ्रष्ट राजनैतिज्ञों को देश से बहार निकाला जाए। राजनीति में बदलाव किये जाएं। लोकतंत्र को पूनः गठित किया जाए। तभी ये आंदोलन, अनशन, प्रदर्शन व विरोध थमेगा। नहीं तो जनता का आक्रोश ऐसे ही उमड़ता रहेगा।