इसलाम का सफ़र -जेहाद से लव जेहाद तक

जिस वक्त अरबों की धरती पर इस्लाम का उदय हुआ था उस वक्त उसके दुनिया भर में प्रचार-प्रसार की बात भी चली होगी। किसी नई चीज का प्रचार करना और लोगों को उस मनवाने के लिए तैयार करना शायद इतना सहज कार्य नहीं है, इसके लिए समय भी दरकार है और धैर्य की आवश्यकता तो और भी ज्यादा है। परन्तु इस्लाम के पैरोकार शायद अत्यंत जल्दी में थे। वे इस्लाम का परचम जल्दी से जल्दी दुनिया भर में फैला देना चाहते थे। इसलिए कुफर, काफिर और जेहाद इत्यादि अवधारणाओं को जन्म दिया गया। काफिर वही है जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता। जो स्वीकार कर ले वह तो मोमिन की श्रेणी में आ जाता है। अब मोमिनों का फर्ज है कि वे काफिरों को भी अपनी श्रेणी में लेकर आएं। पहला तरीका तो समझाने-बुझाने का ही होगा। लेकिन मान लीजिए कोई काफिर समझाने बुझाने से नहीं मानता। वह अपना पंथ, अपना इतिहास, अपनी विरासत और अपने पूर्वजों का नहीं छोडना चाहता तो मोमिनों के पास अपने फर्ज को सरअंजाम देने के लिए एक ही रास्ता बचता है कि वह उसका सिर कलम कर दे। मोमिन मानते हैं कि ऐसा करने से उन्हें जन्नत नसीब होगी और वहां हूरें मिलेंगी वह अलग से ईनाम होगा। जब यह कार्य सामूहिक रूप से किया जाए तो यह जेहाद हो जाता है। इस्लाम के रास्ते में जो भी आएगा या तो उसे मोमिन बनना होगा या फिर जेहादियों के हाथों अपनी जान गंवानी होगी। इस्लाम ने यह प्रयोग दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक किया परन्तु उसके दुर्भाग्य से, हिन्दूस्थान में 800 साल भी ज्यादा बादशाहत करने के बावजूद इस्लाम इस मुल्क को ईरान, ईराक और मिस्त्र की तर्ज में नहीं ढाल सका।

परन्तु लगता है कि इस्लाम के पैरेकारों ने इक्कीसवीं शताब्दी में भी अपने प्रयास नहीं छोडे हैं। उन्होंने भारत में स्वतंत्रता प्राप्त करने के जेहाद के साथ-साथ अब लव जेहाद का अविष्कार किया है। लव जेहाद का अर्थ है कि मुसलमान लडकों को इस बात का बाकायदा प्रशिक्षण दिया जाए कि हिन्दू लडकियों को प्यार के जाल में किस प्रकार फंसाया जाए और उसके बाद उनको मोमिन बनाकर उनसे शादी कर ली जाए। शादी के बाद या तो उन्हें बच्चे पैदा करने वाली मशीन में बदल दिया जाए या फिर किसी वैश्यालय में ढकेल दिया जाए या फिर साऊदी अरब के किसी शेख के हाथों में बेच दिया जाए। भारत में कई ईस्लामी संगठन इस लव जेहाद के लिए बाकायदा बजट मुहैया करवाते हैं और अपने प्रशिक्षित गुर्गों को महाविद्यालयों या विश्वविद्यायों में छात्र बनाकर दाखिल करवाते हैं और यदि ये लव जेहादी किसी हिन्दू लडकी को सफलतापूर्वक अपने प्यार के जाल में फंसा देते हैं तो उन्हें बाकायदा ईनाम, इकराम दिया जाता है। उन्हें सम्मानित किया जाता है और इस्लाम के लिए की गई उनकी इस सेवा के लिए उनकी शान में कसीदे पढे जाते हैं। दूसरे युवकों को इन लव जेहादियों से प्रेरणा ग्रहण करके इसी तर्ज पर इस्लाम की सेवा में जुटने आग्रह किया जाता है।

देश के विभिन्न भागों में इन इस्लामी जेहादियों ने न जाने अभी तक जितनी हिन्दू लडकियों की जिन्दगियां तबाह कर दी और उन्हें वैश्यालयों में धकेल दिया। जहां तक भारत सरकार का ताल्लुक है उसकी दृष्टि में प्यार निहायत निजी मामला है जिसमें स्टेट का पडना ठीक नहीं है दूसरे शायद भारत सरकार इसे अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय में संबंध सुधारने का ही एक नया प्रयोग मान रही है। मुसलमानों की दशा और दिशा पर रपट तैयार करने वाले राजेन्द्र सच्चर जी को शायद इस लव जेहाद की समय पर खबर नहीं मिल पाई नहीं तो वे इन लव जेहादियों के इस बहादुराना काम पर कोई न कोई पुरस्कार मुकर्रर कर देते। वैसे तो भारत सरकार ने एक अल्पसंख्यक मंत्रालय ही खोल रखा है। कोई ताज्जुब नहीं यदि यह मुसलमानों को समान अवसर प्रदान क रने के नाम पर लव जेहाद के लिए ही किसी वजट राशि का प्रावधान कर दे। इस्लाम के कसीदे पढने वालों के लिए तो यह और भी अच्छा अवसर है। वे क ह सकते हैं कि जो जेहाद कश्मीर में हो रहा है तो वह तो खून खराबे वाला जेहाद है। इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता। यह लव जेहाद असली जेहाद है पावित्र और पाक ।

लेकिन केरल उच्च न्यायालय शायद लव जेहाद को इतना पवित्र और पाक नहीं मानता। उसने अभी हाल ही में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को आदेश दिया है कि इन लव जेहादियों के हाथों कितनी हिन्दू कन्याएं इनक षडयंत्रों का शिकार हुईं हैं इसके बारे में वह तुरंत एक विस्तृत रपट हलफनामा समेत न्यायालय में दाखिल करे। न्यायालय ने लव जेहाद के पीछे की शक्तियों को पहचानने के लिए भी कहा है। काबिलेगोर है कि केरल में लव जेहादियों द्वारा हिन्दू लडकियों को फांसने और बाद में उनका जीवन नर्क बनाने की अनेक घटनाएं हो चुंकी हैं कुछ लडकियां इन जेहादियों के चंगुल से छूटकर वापिस अपने घर पहुंची हैं और कुछ को पुलिस की मदद से ढूढा गया है। बदकिस्मिती से लोक-लाज के कारण माता पिता इस प्रकार की घटनाओं की रपट ही पुलिस के पास नहीं देते। इसलिए और कितनी हिन्दू लडकियों की जिंदगी इन लव जेहादियों के हाथों तबाह हो चुकी और कितनी लडकियां साउदी अरब के शेखों के हरम में पहुंच चुकी हैं इसका कोई हिसाब किताब नही हैं। लव जेहाद का यह प्रयोग केवल केरल में ही नहीं देश के दूसरे अनेक राज्यों में भी धडल्ले से किया जा रहा है। केरल की हिन्दू जनता में इसको लेकर बहुत गुस्सा व्यापक है। लेकिन इसके साथ ऐसा सामाजिक कलंक भी जुडा हुआ है जिसके कारण कोई भी इस विषय पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। केरल उच्च न्यायालय की इस पहल का केरल के हर क्षेत्र में स्वागत हुआ है। आशा करनी चाहिए कि सरकार जब न्यायालय में इस लव जेहाद की असली रपट प्रस्तुत करेगी तो कुछ और चेहरों से नकाब उठेगा। लेकिन असली प्रश्न यह है कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने के लिए अतिरिक्त उत्साह दिखाने वाली भारत सरकार क्या सचमुच लव जेहाद का परदाफाश करने की इच्छा रखती है?