फिर अखण्ड होगा भारत
ललित मोहन शर्मा -

      आज से ठीक साठ साल पहले भारत में एक नए युग की शुरूआत हुई। सैकड़ों सालों के संघर्ष तथा लाखों राष्ट्रभक्तों के बलिदान के बाद 14-15 अगस्त की अर्धरात्रि को हमारे देश को स्वाधीनता मिली। 15 अगस्त की सुबह जब देशवासी सोकर उठे तो स्वतंत्र देश में स्वतंत्रता की सुरभि बह रही थी। प्रत्येक देशवासी ने स्वतंत्रता प्राप्ति की खुशी मनाई और तब से लेकर आज तक हम प्रतिवर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं। देश को स्वतंत्रता मिलने के साथ ही विभाजन की त्रासदी से भी गुजरना पड़ा। लाखों निर्दोष देशवासियों के लिए यह आजादी अभिशाप सी बनकर आई। अंग्रेजों ने भारत को खण्डित कर उसके दो टुकड़े कर दिए।

क्यों हुआ विभाजनऔर उस समय का देश का नेतृत्व।

सन् 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर में हिन्दू और मुसलमानों के संगठित प्रयास को देखकर, अंग्रेजों ने भारत में टिके रहने के लिए मुसलमानों को हिन्दुओं से अलग करने तथा अपनी ओर मिलाने की रणनीति अपनाई।

इस नीति के तहत उन्होंने मुस्लिमों को भारत का शासक कहकर उकसाया तथा उन्हें अधिक सुविधाएं देकर तुष्टीकरण की नीति अपनाते हुए अपनी ओर मिलाने के प्रयास किए। अंग्रेजों ने 1904 में ही पूर्वी बंगाल को एक ''मुस्लिम प्रांत'' घोषित करते हुए 'मजहब' के नाम पर अलग देश के बीज बो दिए थे। इसी के परिणामस्वरूप 30 दिसम्बर 1906 को अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। मुस्लिम लीग की मांग पर पृथक निर्वाचन मण्डल तथा जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व की मांग स्वीकार कर अंग्रेजों ने अलगाववाद को हवा दी। मदनमोहन मालवीय ने इसकी आलोचना करते हुए असेम्बली में कहा था कि ''यह अंग्रेजों का भारतीयों में फूट डालने का षडयंत्र है, हम इसका समर्थन नहीं करते।''

स्वतंत्रता के लिए कोशिश कर रहे कांग्रेस के नेतृत्वकर्ताओं ने इस स्थिति का विरोध करने के स्थान पर मुस्लिमों को अपने पक्ष में करने के लिए तुष्टीकरण का ही रास्ता चुना।

स्वामी श्रध्दानन्द ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि ''कांग्रेस अधिवेशनों में भाग लेने वाले मुस्लिम प्रतिनिधियों को किराया तथा यात्रा-भत्ता तक दिया जाने लगा। उनसे भोजन शुल्क भी नहीं लिया जाता था। दस्तरखाने पर (भोजन की थाली में) उनके लिए अन्य प्रतिनिधियों से अलग भोजन परोसे जाते थे। अधिवेशनों में मुस्लिम प्रतिनिधि खूब मौज उड़ाते थे। कांग्रेस की ओर से मुस्लिम तुष्टिकरण का यह प्रारंभिक स्वरूप था।''

इस तुष्टीकरण का ही परिणाम था कि मुस्लिम लीग ने स्वतंत्र भारत में पहले प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी जताई, जिसे अंग्रेजों की सहमति प्राप्त थी लेकिन कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं को यह मान्य नहीं था। जिन्ना व नेहरू की महत्वाकांक्षाओं के बीच अंग्रेज अपनी चाल चलने में सफल हो गए और जाते-जाते देश के दो टुकड़े कर गए।

विभाजन की विभीषिका

भारत का जो हिस्सा अलग होकर पाकिस्तान बना, वहां के हिन्दुओं पर कहर टूट पड़ा। बहुसंख्यक मुसलमानों ने हिन्दुओं पर बर्बर अत्याचार किए, जिसमें सेना व पुलिस के मुस्लिम जवानों ने उनका खुलकर साथ दिया। लाखों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया, अबलाओं (महिलाओं) के साथ अमानुषिक कृत्य किए गए। अनेक लोगों को जबरन मुसलमान बना लिया गया तथा जो नहीं बने उनका सब कुछ लूटकर भारत चले जाने को मजबूर किया गया। उस समय की घटनाओं को सुनकर आज भी रोंगटे खडे हो जाते हैं। कैसी थी वह पाकिस्तान की सप्रेम भेंट- 15 अगस्त 1987 को लाहौर से अमृतसर के लिए पहली गाड़ी में एक भी यात्री जिंदा नहीं था। छोटे बच्चों की लाशें उनकी माताओं के मतृ शरीरों पर चिपटी थीं। माताओं व बहिनों के अंग-भंग कर दिए थे। गाड़ी के सभी डिब्बे लाशों से भरे थे और अन्तिम डिब्बे पर लिखा था ''स्वतंत्र भारत को पाकिस्तान की सप्रेम भेंट।''

इस भीषण संकट में जहां कम्युनिस्टों ने पाकिस्तानी मुसलमानों का साथ दिया, वहीं हमारे कांग्रेस के कुछ लोग 'हिन्दू-मुस्लिम एकता' का राग अलाप रहे थे। उस समय केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने अपनी जान की बाजी लगाकर हिन्दू समाज की पूरे सामर्थ्य से सुरक्षा की तथा अधिकांश हिन्दुओं को बचाकर लाने में सफल हुए।

आज भी है विभाजन की कसक

पाकिस्तान अलग देश बन गया और उस समय के मजहबी उन्माद में आकर कुछ भारतीय मुसलमान वहां चले गए लेकिन आज भी उनमें भारत में रह रहे अपने सम्बन्धियों और मित्रों के प्रति मोह देखने को मिलता है। यद्यपि कट्टरवादी ताकतें उनके इस मोह को तोड़ने का पूरा प्रयास कर रही है, लेकिन अपनी जन्म-भूमि के प्रति उनके मोह को खत्म करने में सफल नहीं हो सकी है। आज भी जब कोई पाकिस्तानी अपने पुश्तैनी गांव में पहुंचता है तो वह आंखें नम किए बिना नहीं रहता और बहुत से तो यह कहने से भी नहीं चूकते कि यह विभाजन बहुत गलत हुआ। हमें एक राष्ट्र बनकर रहना चाहिए। हमारी सभ्यता और संस्कृति एक ही है। सिन्धु के नाम से ही हमारे देश का नाम हिन्दुस्थान पड़ा और उसे भारत में ही होना चाहिए।

फिर एक होगा भारत

महान् क्रांतिकारी-योगिराज-महर्षि अरविन्द ने आज से 60 वर्ष पहले 1957 में यह भविष्यवाणी कर दी थी कि ''देर चाहे कितनी भी हो पाकिस्तान का विघटन और भारत में विलय निश्चित है।'' इसकी एक झलक हमें श्री अरविन्द की जन्मशताब्दी वर्ष 1972 में देखने को मिली थी। उस समय 92 हजार पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डालकर भारतीयों के सम्मुख आत्मसमर्पण कर दिया। उल्लेखनीय है कि महर्षि अरविन्द का जन्म 15 अगस्त 1872 में को हुआ था और हमारा स्वतंत्रता दिवस भी 15 अगस्त ही है। यह मात्र संयोग ही नहीं बल्कि भगवान द्वारा श्री अरविन्द के बताए मार्ग पर चलने की स्वीकृति भी है। 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के अवसर पर योगिराज ने स्वयं अपने उद्बोधन में कहा कि ''भागवत शक्ति ने- जो कि मेरा पथ-प्रदर्शन करती है- उस कार्य के लिए अपनी अनुमति दे दी है और उस पर मुहर लगा दी है जिसके साथ-साथ मैंने अपना जीवन आरम्भ किया था। देश का विभाजन दूर होना ही चाहिए, वह दूर होगा या तो तनाव के ढीले पड़ जाने से या शांति और समझौते की आवश्यकता को धीरे-धीरे हृदयंगम करने से, या किसी कार्य को मिलजुलकर करने की सतत् आवश्यकता से या उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए साधनों की जरूरतों को महसूस करने से। जिस किसी तरह क्यों न हो, विभाजन दूर होना ही चाहिए और दूर होकर ही रहेगा। उन्होंने यही बात सन् 1950 में अपने प्रिय शिष्य कन्हैया लाल माणिक मुंशी जी से भी कही थी। महर्षि ने कहा कि ''भारत फिर से एक होगा मैं उसे स्पष्ट देख रहा हूं।''